“प्यार वाली खिड़की”

एक ही तो खिड़की थी
जिससे दीदार हो जाता था
खिड़की खोलने-बंद करने में
ही इजहार हो जाता था
आज वो भी बंद कर दी तुमने.!
अब वो हंसी नजारे कैसे होंगे ?
भेजा करते थे जो एक खिड़की से
दूसरी खिड़की पर हम चिट्ठियां
अब वो इशारे कैसे होंगे ?
रात भर देखते थे उठ-उठकर
तुम्हें खिड़की से
अब तो तुम्हारे दीदार को
तरसते चाँद-तारे होंगे
खोल दो ना वो प्यार वाली खिड़की*
तुम्हें रब का वास्ता’
वरना हम भगवान को प्यारे होंगे ||

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Responses

  1. जितनी तारीफ करूं कम ही है…
    आपकी कविता में अद्भुत भाव हैं सच्चाई है..
    एक अलग ही एहसास है
    जब भी आपकी कविता पढ़ता हूं कुछ नया पाता हूँ

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