प्रतीक्षा

नव – प्रभात है बीती निशा ,
जागो कोई कर रहा प्रतीक्षा ।
धूप खिली है, सब पंछी भी उठ गए,
अब रैन कहां जो सोए हो।

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Responses

  1. वाह वाह, बहुत सुंदर, जागो कोई प्रतीक्षा कर रहा है, से कर्म के प्रतीक्षा करने का बोध भी हो रहा है। लेखनी की विलक्षण क्षमता को सलाम।

    1. आपकी प्रेरक समीक्षा के लिए बहुत सारा धन्यवाद सतीश जी 🙏
      बहुत प्रेरणा मिलती है सर आपकी समीक्षा से..

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