प्रथ्वी के सौंदर्य वर्णन का उल्लास

कई दिनो से सोच रहा था
पंत की तरह प्रकृति चित्रण करूं
पद्मकार की तरह ऋतु वर्णन करूँ
परंतु एक दिन सुबह का अखबार पढ़कर मेरा विचार बदल गया
अखबार का शीर्षक था
मनुष्य ने प्रकृति का अपहरण कर लिया है
फिरौती मे मांगा है
बहु मंजिला इमारतें
उद्योगों के लिए स्थान
अधिक उत्पादन का वरदान
वन्य जीवों का वालीदान
भूमि का टुकड़ा जिसमें बना सके श्मशान
और अंत में प्रकृति के प्राण
प्राण बचाने के लिए प्रकृति ने उसकी उपरोक्त शर्ते मान लिया था
इसलिए मनुष्य ने उसे दे दिया प्राण दान
लेकिन प्रकृति के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर के
या तो बेंच दिया या तो दफनाया
या फिर जला कर राख कर दिया
तब तक मेरा प्रथ्वी के प्रकृति चित्रण का उल्लास
शोक में तब्दील हो चुका था

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