प्रभु! मैं तुझको कैसे पाऊं।

कौन है यहां अपना मेरा,
तुझ पर ही है, अर्पित जीवन सारा।
कौन-सी मैं व्यथा सुनाऊं,
प्रभु! मैं तुझको कैसे पाऊं।
कब तक यूं आस लगाऊ।
कुछ तो बोलो, हे प्रभु!
कब तक मैं यह ज्योति जलाऊ,
बुझ रही आशा की लौ,
कैसे इसमें प्रकाश जगाऊं,
प्रभु मैं तुझको कैसे पाऊं।

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Responses

  1. ईश्वर तो सर्वव्यापी है। कबीर की पंक्ति याद आती है मुझे ” जहा वे ईश्वर को सब श्वासो की श्वास में बतलाते है।

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