प्रेम का लबलब घड़ा…

रुक मुसाफिर ! रुक जरा !
मैं हूँ प्रेम का लबलब घड़ा.
कीर्ति तेरे परिश्रम की
कम नहीं फैली हुई है…
राह में तेरे मुसाफिर
देख ये प्रज्ञा’ खड़ी है
सुन जरा ओ पथिक प्यारे !
देख टूटा जाये ये लबलब घड़ा
भर ले अंजुल मेरे नीर से
वरना छलक जायेगा यह घड़ा…
सुन जरा ओ पथिक प्यारे !
पी ले तू मुझको जरा
प्यास तेरी मिटेगी और
दर्द कम होगा मेरा…


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8 Comments

  1. Geeta kumari - November 23, 2020, 7:56 am

    वाह,लाजवाब अभिव्यक्ति

  2. Anu Singla - November 23, 2020, 8:03 am

    Beautiful

  3. Rishi Kumar - November 23, 2020, 11:24 am

    अति सुंदर

  4. Satish Pandey - November 23, 2020, 9:46 pm

    बहुत खूब अतिसुन्दर अभिव्यक्ति

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 25, 2020, 7:56 am

    अतिसुंदर

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