‘प्रेम के उपनिषद्’

थक गई हूँ अब रोते-रोते,
तन्हा राहों पर चलते-चलते
इन बिखरी साँसों की
अरज बस है यही तुमसे
मिलन जब भी हमारा हो
ना कोई गिला-शिकवा हो
‘प्रेम के उपनिषद्’ पर बस
नाम अंकित तुम्हारा हो
बिखर कर टूटने से पहले
जब मिलना कभी हमसे,
मुझी में डूब जाना तुम,
फकत बाँहों में भरकर के…

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Responses

  1. वाह। आपकी कविता प्रेम रस में डूबा हुआ है। यही तो सच्चे 💕 प्रेम के प्रतीक है।

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