फोन चोरी हुआ

कविता- फोन चोरी हुआ
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सुनो भाई,
कब तक गुजारोगे,
जीवन में चोरी करके,
मेरा या गैरों का-
फोन चुरा करके,
इस काम से क्या
जीवन सुधर जाएगा,
चोरी करके –
धन से घर भर जाएगा,
या समाज में
प्रतिष्ठा या सम्मान बढ़ जाएगा,
आखिर क्यों करते हो चोरी –
क्या यह रोटी कपड़ा मकान है,
कुछ को रोटी नसीब नहीं
बुरी दशा में चोरी की नहीं
मांग लेता है भिख कहीं
ढूंढ लेता है काम कहीं
भाग जाता है परदेस कहीं
थोड़े से पैसे के लिए-
कभी भी चोरी किया नहीं
किसी काम को करने में
आलस कभी भी किया नहीं
किया नहीं खुद को कभी,
खुदा के नजरों में बदनाम,
दे रहा हूं वचन तुम्हें
सदा अटल रहूंगा,
छोड़ दो चोरी करना
ना तुम्हें कोई चोर कहेगा
भटके हुए इंसान हो
मैं भी तुम्हें जीसस की तरह माफ करूंगा
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✍️कवि ऋषि कुमार प्रभाकर


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4 Comments

  1. Geeta kumari - April 6, 2021, 9:22 pm

    चोरी को रोकने का प्रयास करती हुई अति उत्तम रचना

  2. Satish Pandey - April 6, 2021, 9:26 pm

    बहुत लाजवाब अभिव्यक्ति ऋषि। ग्रेट

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - April 7, 2021, 3:21 pm

    वाह

  4. Pragya Shukla - April 7, 2021, 10:42 pm

    चोरी करने वालों पर तंज कसती रचना

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