फोन पर बातें

जब रूबरू हों।
तो गुफ्तगु हो।
एक मैं रहूँ,
और एक तू हो।
कुछ अनकही बातें,
आँखों से सुन लूं।
फोन पर बातें मुझे भाती नहीं,
बगैर देखे बातें समझ आती नहीं।

होंठ से तेरे, शब्दों का झड़ना,
दिल में उतरना, कानों में पड़ना।
प्रेम मनुहार, वो मीठी तकरार,
तेरा रुठना, और मुझसे लड़ना।
दिल की धड़कनें,
दिल से सुन लूं।
फोन पर बातें मुझे भाती नहीं,
बगैर देखे बातें समझ आती नहीं।

तेरी बातों की चहक।
तेरे तन की महक।
तेरे चेहरे का नूर,
तेरी आँखों की चमक।
फोन में कहाँ पाता हूँ ,
सामने हो तो सुन लूं।
फोन पर बातें मुझे भाती नहीं,
बगैर देखे बातें समझ आती नहीं।

देवेश साखरे ‘देव’

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

12 Comments

  1. राम नरेशपुरवाला - September 23, 2019, 4:23 pm

    वाह क्या बातें h

  2. सुरेन्द्र मेवाड़ा 'सुरेश' - September 23, 2019, 4:37 pm

    वाह कविराज

  3. Poonam singh - September 23, 2019, 4:47 pm

    Nice

  4. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 23, 2019, 5:45 pm

    Wow very beautiful

  5. NIMISHA SINGHAL - September 23, 2019, 9:20 pm

    Kya khub

  6. Mithilesh Rai - September 24, 2019, 10:59 pm

    लाजवाब प्रस्तुति

Leave a Reply