बंजर पे बसेगी फिर बहार

बे-कार हूं बे-रोजगार नहीं
आदतों का शिकार नहीं
शौक से नहीं परहेज मुझे
तेरी तरह शौक का गुलाम नहीं

इक सुई का किया आविष्कार नहीं
उसे हर नई खोज की दरकार है
मेरी जरूरतों का है ईल्म मुझे
तेरी तरह दुष्-स्पर्धा का बीमार नहीं

मेरे अपनों को जो सुख हासिल नहीं
उसका न लेना है हमेशा स्वाद मुझे
तेरे सुख के लिए खड़े हैं कयी महल
बाबा की झोपड़ी की मुझे दरकार है

भरा आंगन ही था भाता मुझे
अकेलेपन का उपहार तूने दिया
अब तो इसकी भी आदत हो चुकी
भीड़ में भी लक्ष्य से न हटता ध्यान है

माली ज़मीं के सूनेपन को
भरता कई तरह के फूलों से
उन्हें अलग मंदिरों की तलाश है
हर घर को विखराव का शाप है

ये कैसी यात्रा है हर घर की
विखराव न चाहता बचपन
टूटता शिशु का कोमल मन
परिवार के सोंच में बिलगांव है

कहां गया वो समय कि जब
बड़ों की कहीं हुई बातों को तब
छोटे करते रहते थे संधान सदा
न हो पाते थे वो कभी गुमसुदा

तलाश है फिर उस बसंत की
बंजर पे बसेगी फिर बहार
अवयबों के आशियानें अलग
इकजूट होंगें फिर एक बार

इक रितु कभी तो आयेगी
इतिहास फिर दुहराया जायेगा
स्वार्थ से सब ऊंचे उठकर
एकता मंत्र फिर अपनायेगा

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

कोरोनवायरस -२०१९” -२

कोरोनवायरस -२०१९” -२ —————————- कोरोनावायरस एक संक्रामक बीमारी है| इसके इलाज की खोज में अभी संपूर्ण देश के वैज्ञानिक खोज में लगे हैं | बीमारी…

अपहरण

” अपहरण “हाथों में तख्ती, गाड़ी पर लाउडस्पीकर, हट्टे -कट्टे, मोटे -पतले, नर- नारी, नौजवानों- बूढ़े लोगों  की भीड़, कुछ पैदल और कुछ दो पहिया वाहन…

Responses

  1. बहुत सुंदर कविता है ।परिवार के साथ के लिए भौतिक वस्तुओं की उपेक्षा करती हुई बहुत सुंदर प्रस्तुति

New Report

Close