बदल पाते

दिन अगर बदल सकते
पुनः अपने बचपन में लौट पाते ।
फिर से पापा की नन्हीं परी बन
चार पैसे की नेमचुस खरीद लाते।
घर की चौखट पे बैठे,
बाट देखती चाचू की,
पटाखो के संग घरकुल्ला खरीद लाते।
धान के नेवारी तले, पिल्ले को रख
गभी उसकी भूख की चिंता
कभी ठंढ से बचाने का डर
भैया के संग मन से निकाल आते।
ना अपनों के
दूर जाने की फिक्र
मिले फिर वो लम्हा
जो हो दुनिया से इतर
पुनः विश्वास की ज्योत जगा पाते ।
अपनों का बदलना है भाता कहाँ
कुछ भी हो, वो हमसे दूर जाता कहाँ
कङवाहटे जिसने यह है घोली
दोष उसका नहीं जो बनती है भोली
यह टीस मिटा पाते कहाँ ।


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Related Posts

भोजपुरी चइता गीत- हरी हरी बलिया

तभी सार्थक है लिखना

घिस-घिस रेत बनते हो

अनुभव सिखायेगा

10 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 7, 2020, 7:04 pm

    बहुत खूब

  2. Geeta kumari - December 7, 2020, 7:10 pm

    अति सुन्दर रचना

  3. Virendra sen - December 7, 2020, 10:43 pm

    सुंदर अभिव्यक्ति

  4. Satish Pandey - December 7, 2020, 10:49 pm

    बहुत खूब

  5. Pragya Shukla - December 8, 2020, 12:38 am

    काश !!!
    बहुत लाजवाब

Leave a Reply