बादल की बौछार

दो बूँद गिरा गया बादल
महका है धरती का आँचल
बन सर्द पवन लहराई
मिट्टी की महक-महकाई

सब काम काज रुक गए हैं
बादल के आगे झुक गए हैं
ममता ने ली है अंगड़ाई
लो सब ने प्यास बुझाई

खामोश हुआ इंसान जब
पड़ी गर्ज की चमक दिखाई

पानी-की बौछार चलाके
संगीत में सूर को मिलाके
गालों को मर्म सहलाएँ
कानों से थरथरी आएँ

सप्तधनू आकाश में छाया
देने सूक्ष्म श्रेस्ट बधाई

दो बूँद गिरा गया बादल
महका है धरती का आँचल
बन सर्द पवन लहराई
मिट्टी की महक-महकाई
©M K Yadav


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12 Comments

  1. Geeta kumari - August 19, 2020, 7:35 am

    बहुत सुंदर रचना

  2. Rishi Kumar - August 19, 2020, 8:04 am

    Very good

  3. An Ordinary Artist - August 19, 2020, 11:53 am

    👏👏👏

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - August 19, 2020, 2:04 pm

    Sunder

  5. Satish Pandey - August 19, 2020, 7:02 pm

    दो बूँद गिरा गया बादल
    महका है धरती का आँचल
    — बहुत सुन्दर

    • M K Yadav - August 20, 2020, 5:44 am

      शुक्रिया! शुक्रिया सतीश जी 🙏
      Thank you so much 👏👏👏

  6. प्रतिमा चौधरी - September 2, 2020, 7:21 am

    बहुत सुंदर कविता।

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