बिल्ली की पूछ

बिल्ली की पूंछ
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रुकी कलम अगर
भूत भविष्य बिखर जाएगा
रखो न हाथ गिरवी,
जमाना भूखे बच्चों को-
व्रती बता जाएगा,
जिन्हें शुद्ध पानी नसीब नहीं,
उन्हें बोतल का-
पानी पीने की सलाह दे जाएगा,
अब तो खबर बेखबर हुई
टीवी पर झूठी बहस हुई
रोजगार भ्रष्टाचार
रेप हत्या एसिड,
संसद में अपराधियों की संख्या बढ़ रही,
जनहित के मुद्दे सब गायब हैं,
हीरोइन की शादी, नेता की नींद,
सरकारी संपत्ति बेचने की डील,
किसकी बेटी भागी किसके साथ है
अश्लील जोक्स कार्टून,
निरोध,जापानी तेल से भरा अखबार है
बिल्ली की पूंछ
पर बहस हो रही है
टीवी पर कुछ बड़ाई कर रहे हैं
संसद में कुछ लड़ाई कर रहे हैं
एक आंख मारता
एक भक्ति के नाम पर झूठ बोलता,
जहां पशुओं से अधिक
इंसान की कीमत गिर गई,
गाय से अधिक-
भैंस की कीमत हो गई,
किसान भी कितना लाचार है,
गाय का दूध बिके ना साठ रुपए में,
गोमूत्र बिके सौ रुपए में,
इन पर बहस कौन करेगा,
मां भारती का दर्द कौन लिखेगा,
भूखे नंगे सो रहे जो फुटपाथ पर
उनका दर्द कौन लिखेगा,
हमें कुछ हाथ जुबा गिरवी लग रहे हैं
कविता को हथियार बनाकर,
‘ऋषि’ क्या तुम भी स्वतंत्र निष्पक्ष
हर मौसम में हर प्रकार की
जनहित से जुड़ी कविता लिख रहे ।
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

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Responses

  1. यथार्थपरक उम्दा अभिव्यक्ति

    आपकी लेखनी जब भी चलती है तो युवा जोश दिखाती है

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