बेवफा से वफ़ा

दिल ले के वो नादान, दग़ाबाज़ी करते चले गए।
रेत में हम उनके लिए, महल बनाते चले गए।।
हमें क्या पता था, खूबसूरत समंदर की बेवफ़ाई।
हम तो समंदर की सुरत पे, एतवार करते चले गए।।
जो होना था सो तो हो गया, क्या करे “अमित ” ।
ए आँखें भी बिन सावन के ही, बरसते चले गए।।


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10 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 17, 2020, 5:46 pm

    अतिसुंदर

  2. Praduman Amit - October 17, 2020, 6:48 pm

    Thanks Pabdit Jee

  3. Pragya Shukla - October 17, 2020, 7:05 pm

    Beautiful poem

  4. Satish Pandey - October 17, 2020, 7:12 pm

    उम्दा पंक्तियाँ

  5. Anu Singla - October 17, 2020, 9:51 pm

    सुन्दर

  6. Suman Kumari - October 17, 2020, 10:45 pm

    सुन्दर रचना

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