भूखा गली में सोया

दर्द आम जन का
समझो तो तब मनुज हो
आवाज बन सको तो
सचमुच में तब मनुज हो।
भूखा गली में सोया
पूछा नहीं किसी ने
बच्चा भी उसका रोया
पूछा नहीं किसी ने।
वो गिर पड़ा अचानक
पैरों में दम नहीं था,
लोगों ने समझा कोई
दारू पिया हुआ है।
पैसे का बल दिखा कर
शोषण किया था उसका
सब देख कर भी हमने
यह मुँह सिया हुआ है।
मतलब ही क्या है हमको
लूटे किसी को कोई,
यह सोच कर ही हमने
यह मुँह सिया हुआ है।
वो रो रही थी पथ में
हमने न पूछा कुछ भी
हम चल दिए फटाफट
यह मुँह सिया हुआ है।
ठंडा उसे लगा था,
चिपका हुआ था माँ से
हमने किया न कुछ भी
यह मुँह सिया हुआ है।
ऐसे में कैसे बोलें
हम दर्द जानते हैं,
इंसान-जानवर में
हम फर्क जानते हैं।
सचमुच में यदि मनुज हैं
मुँह खोलना ही होगा,
दर्द में मनुज के
कुछ बोलना ही होगा।


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4 Comments

  1. Geeta kumari - January 27, 2021, 10:11 pm

    “सचमुच में यदि मनुज हैं मुँह खोलना ही होगा,
    दर्द में मनुज के कुछ बोलना ही होगा।”
    _______असहाय लोगों का दर्द बयान करती हुई कवि सतीश जी की बेहद संजीदा रचना। बेहतर शिल्प और भाव का सुंदर समन्वय। अति उत्तम प्रस्तुति

  2. Devi Kamla - January 27, 2021, 11:03 pm

    वाह बहुत खूब

  3. Suman Kumari - January 28, 2021, 4:24 am

    अति सुन्दर।
    फ़र्ज़ निभाये बिना, मनुज कहलाने के कहां अधिकारी हम

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 28, 2021, 7:51 am

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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