मगर मत तोड़ना ये तार

हां दोस्ती है,
इन दिनों रजाई से
उसको ओढ़े बिना नहीं कटते
सुनहरे पल पहाड़ी रातों के।
खुद की तारीफ के
न पुल बांधो
हम तो कायल रहे हैं वैसे ही
तुम्हारी नेह भरी बातों के।
परोसो मत
लजीज व्यंजन यूँ
हम तो खुश हैं खिला दो
केवल तुम,
दाल-चावल स्वयं के हाथों के।
व्यस्त हो
इन दिनों भले ही तुम
कम न हों पल
ये मुलाकातों के।
दूर रहना भले ही तुम
मुहब्बत की निगाहों से
मगर मत तोड़ना ये तार
अपने मन के नातों के।
—- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
(काव्यगत विशेषता- एक प्रयोग है, जिसमें प्रत्येक पद का अपना अलग-अलग पूर्ण अर्थ भी है, और संयुक्तार्थ भी हैं।)

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