मझधार

हमें बस जीवंत बोध की दरकार है
नहीं मुझे खुद पर, हाँ तुझपर एतवार है
हम सजग प्राणी भले हैं
पर स्वार्थ से सना अपना प्यार है ।
स्वार्थ से रचा-बसा राब्ता
यह बस नाम है अनुराग का
राफ्ता-राफ्ता उधङती गयी धज्जियां
अवशेष खुद का अहंकार है ।
तादम्यता का दामन थाम के
समझौते के बल पर जो बसा
स्नेह का नामो-निशान नहीं
डर-डर के रहे फिर भी टकरार है ।
हर क़दम को फूक -फूक कर रखा
बढने से पहले खुद से कहा
कबतक यूँ सहते रहोगे
ले डूबा वही समझा जिसे
मझधार है ।


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Related Posts

भोजपुरी चइता गीत- हरी हरी बलिया

तभी सार्थक है लिखना

घिस-घिस रेत बनते हो

अनुभव सिखायेगा

8 Comments

  1. Pragya Shukla - December 6, 2020, 11:07 pm

    बहुत बहुत उम्दा
    पंक्तियां और लय के साथ सुंदर शब्दावली

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 7, 2020, 10:27 am

    सुंदर

  3. Geeta kumari - December 7, 2020, 2:28 pm

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  4. Satish Pandey - December 7, 2020, 10:52 pm

    उम्दा प्रस्तुति

Leave a Reply