मदिरा और बारिश

ऐ मदिरा, मैं नशे में तेरे चूर रहता हूं होश आ भी जाए तो खुद को भूल जाता हूँ |
आदत सी हो गई है तेरी इस कदर, न पाऊं तुझे पास तो बैचेन हो उठता हूँ |

नासमझ हैं वो लोग जो तुझे पीने वाले को शराबी कहकर बदनाम करते हैं |
तू तो वो अमृत है जिसे हलक से नीचे उतार कर इंसान बड़े से बड़ा गम भी भुला दे |

ऐ मदिरा, आज फिर से मौसम ने करवट ली है, एक बार फिर तेरी सौतन (बारिश) बाहर जमकर बरस रही है |
और मेरी हालत तो देख, गोपीयों से घिरे कृष्ण की तरह हुई है ठीक से उसे देख भी नहीं सकता |

उसे निहारता हूं तो तू गले को चुभने लगती है और तुझे हलक में उतारु तो वो जमकर बरसने लगती है |
तेरे पास होने पर उसकी ईर्ष्या साफ झलकती है, उसमें (बारिश) भीग जाऊं तो तू पैमाने को खन से तोड़कर कर बिखर जाती है |

ऐ मदिरा, मैं इस दोतरफा प्रेम में पिस चुका हूँ और उसका बेमौसम आना नामुमकिन सा लगता है |
मेरी वफा का कुछ तो लिहाज़ कर पगली मुझसे तेरी दूरी अब बर्दाश्त नहीं हो पाती |

वो माशूका छोड़कर चली जायेगी अपने किसी और प्रेमी की बाहों में इसमें कोई संदेह नहीं |
पर तू एक बार जिसके हलक से नीचे उतर जाए, तो मजाल क्या उसकी जो किसी और का हो जाए |


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

3 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 27, 2020, 2:29 pm

    बेहतरीन

  2. Satish Pandey - November 27, 2020, 11:20 pm

    सुन्दर रचना

  3. Pragya Shukla - November 27, 2020, 11:54 pm

    हरिवंश राय बच्चन जी का जन्मदिन है आज
    उन्ही की कुछ पंक्तियां याद आ गईं मुझे
    मंदिर मस्जिद बैर कराते
    मेल कराती मधुशाला’
    उम्दा रचना👌👌👏👏

Leave a Reply