मरीचिका

सुंदरता के प्रति हमारा उन्माद इतना
अधिक रहा है कि हमनें तकनीकों
का सहारा लेकर हर वस्तु को
सुंदर बनाने का भरसक
प्रयास किया…!!

जबकि हमें बदलनी चाहिए थी अपनी
दृष्टि जो रचती है भेद सुंदरता
और असुन्दरता का !!

दुर्भाग्य से हम विफ़ल रहे हैं समस्याओं
के वास्तविक मूल को पहचानने में और
भटकते रहते हैं अपने मन द्वारा
रचित मरीचिकाओं में..!!

©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
(06/03/2021)

Published in मुक्तक

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