माता सीता

वो प्यारी सी नन्ही सी कली थी
धरती से वो जन्मी थी
जनक जी के महल में लेकिन
पाली पोसी और बड़ी हुई थी
मखमल पर ही सोती थी वो
कुछ भी कष्ट न देखे थी
जैसे ही वो बियाही गई फिर
कष्टों में ही वो जीती रही
न सुख पाया उसने रानी का
न पाया सुख कोई और
रही भटकी फिर वन वन सीता
बाल्मीकि जी की शरण मिली
फूल उठाना भी भारी था जिसको
वन से लकड़ी काटती रहीं
स्वयं ही अपनी रसोई बना कर
अपने बच्चों में खोई रहीं
देकर प्रमाण वो आई थी महल में
फिर भी किसी ने मानी थी
किया विरोध सभी ने उसका
निष्पाप को पापी मानती रही
कष्टों को ही झेल रही थी
फिर प्रमाण की बारी आई
दिया प्रमाण फिर सीते ने ऐसा
सबकी बोलती बंद करी
चली गई जहां से आई थी
पृथ्वी माँ को गोद में
देकर प्रमाण वो अपने जीवन का
सदा के लिए वो सो गई।।


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By Neha

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8 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - May 5, 2020, 9:29 pm

    Nice

  2. Dhruv kumar - May 7, 2020, 11:22 am

    Nyc

  3. Pragya Shukla - May 8, 2020, 10:15 am

    I like

  4. Abhishek kumar - May 8, 2020, 1:35 pm

    Good

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