मानवता

मानव ही दानव बने, औ बनता भगवान्
मानव तन अनमोल है, मानवता है प्राण
मानवता है प्राण, धार्मिक झगड़े छोडो
ईश्वर सागर मान, नदी अवतार है जोडो
कह पाठक कविराय, एक उन्माद है दानव
ईर्ष्या नहीं सद्भाव, जोड़िए सब को मानव

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)

वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहीं भारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये माता…

Responses

  1. मानव तन अनमोल है वह कब की लेखनी से निकली एक बहुत ही सुंदर रचना

New Report

Close