मायूस

बड़े मायूस होकर, तेरे कूचे से हम निकले।
देखा न एक नज़र, तुम क्यों बेरहम निकले।

तेरी गलियों में फिरता हूँ, एक दीद को तेरी,
दर से बाहर फिर क्यों न, तेरे कदम निकले।

घूरती निगाहें अक्सर मुझसे पूछा करती हैं,
क्यों यह आवारा, गलियों से हरदम निकले।

मेरी शराफत की लोग मिसाल देते न थकते,
फिर क्यों उनकी नज़रों में, बेशरम निकले।

ख्वाहिश पाने की नहीं, अपना बनाने की है,
हमदम के बाँहों में ही, बस मेरा दम निकले।

देवेश साखरे ‘देव’

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12 Comments

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 15, 2019, 10:34 am

    वाह बहुत बढ़िया रचना

  2. राम नरेशपुरवाला - September 15, 2019, 11:39 am

    Good

  3. Mithilesh Rai - September 15, 2019, 11:40 am

    बहुत खूब

  4. Poonam singh - September 15, 2019, 12:38 pm

    Nice

  5. NIMISHA SINGHAL - September 16, 2019, 1:29 pm

    Good one

  6. राही अंजाना - September 16, 2019, 2:05 pm

    बढ़िया

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