मिलन की प्यास

आपकी चाहत के तलबगार है
हम।
आओ एक हो जाए हम।।
ढलती गोधूलि , उस पे हवा के झोंके।
उफ,,, रुत भी कहने लगी एक जान है हम।।

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दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

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गोधूलि

फिर वही ढलती गोधूलि मन में एक एहसास जगा दिया। नादान था दिल, बिना सोचे दिल दग़ाबाज़ को दे दिया।।

Responses

    1. शुक्रिया पांडे जी। आपने मेरी रचना को स्तरीय समझा बहुत बहुत धन्यवाद। 

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