मुलाकात के सिलसिले

उनका नंबर भी है
और मुलाकात के सिलसिले भी होते रहते हैं
मुकद्दर ऐसा है
हम फिर भी रोते रहते हैं
बात सदियों से नहीं हुई उनसे
ना हम उनकी तरफ देखते हैं
आ भी जाएं गर वो सामने तो हम
नजरें अपनी झुका के रखते हैं
ना खबर हो कहीं मेरे दिल की
अपने जज्बात छुपा के रखते हैं
हाँ, हुई थी एक बार गुफ्तगू उनसे
वो मुस्कुराये थे हमें छूकर
मारा था थप्पड़ जोर से हमने
क्योंकि हम फरेबी उन्हें समझते हैं…..

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