मृगमरीचिका

मृगमरिचिका
मृगतृष्णा यह जीवन सारा
तृष्णा में डूबा जाता है,
तृष्णाग्रस्त हो खोया रहता है,
हाथ नहीं कुछ आता है।

मरुभूमि में उज्जवल जल सा…
बार-बार बहकाता है।
कस्तूरी की तरह दिशाविहीन हो भटका- भटका जाता है।

रेत खार की परतों पर
सूर्य, चंद्र जब प्रकाश बरसाता है,
लगता जैसे भरा जलाशय
पास जाओ तो अदृश्य हो जाता है।

दीपक तले पतंगा फिर फिर -फिर,
आकर्षित हो जाता है।
अपने पंख जलाकर
औंधे मुंह धरती पर आता है।

चांद से मिलने खोई चकोरी
प्यासी उड़ -उड़ जाती है
खाती है अंगार मोह में
अपनी चोंच जलाती है।

इटली के मैसीना जल से
आकाश में दृश्य बनते हैं
घर, महल हवा में दिखते
जादुई तिलस्मी लगते है।

जापानी तोयामा खाड़ी
आकाश में दृश्य बनाती है
बार-बार लोगों के मन में
डर और भ्रम फैलाती है।

सत्यता को जांचे बिना जब..
तृष्णा में हम मरते हैं।
जान नहीं पाते सच्चाई,
भूगर्भ की उथल-पुथल से
कोहरे और गैस से
हवाओं में दृश्य बनते हैं।
ऐसा ही ये जीवन सारा
भटका -भटका जाता है।
परमपिता में लीन हुए जो
उन्हें कोई न भटका पाता है।

निमिषा सिंघल


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1 Comment

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 7, 2021, 9:27 pm

    सुंदर

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