मेरा मन

सोना तपा कुंदन बना,
कुंदन तप के राख
मैं तपी तपती रही,
कुंदन बनी ना राख
बरखा ऋतु आई,
आई नई कोंपल हर शाख
मेरे मन भी उठी उमंगें,
छू लूं मैं आकाश

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

ठान लूँ गर

ठान लूँ गर मैं तो कुछ भी कर सकती हूँ ठान लूँ गर मैं तो असंभव भी संभव कर सकती हूँ ठान लूँ गर मैं…

बरखा ऋतु

आज फ़िर मेघा बरसे, रिमझिम – रिमझिम, मन – मयूर नृत्य कर उठा, छ्मछम – छमछम। ठंडी – ठंडी पवन चली है, खिल उठे सारे…

Responses

  1. कवि ने अपनी व्यथा को बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है तथा बहुत ही सहजता से अलंकारों का प्रयोग किया है

New Report

Close