मेरी आँखों को ऐसी हँसी आ रही है

मेरी आँखों को ऐसी
हँसी आ रही है
जैसे मोमबत्ती जलकर
पिघलती जा रही है
कुछ जल गई रौशनी की फिक्र में
कुछ बेखबर-सी
पिघलती जा रही है
पिघल गई
धागे को जलाने के जश्न में
आधी जली तम मिटाने के लिए
आधी पिघलकर
खुदी में लिपटती जा रही है
नश्वर है
ये अंधेरा और रात का साया,
बता रही है ये और
मचलती जा रही है….

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Responses

  1. वाह!
    मोमबत्ती और जीवन की विषमता को व्यक्त करती शिल्प के प्रति समर्पित बहुमूल्य एवं उच्चस्तरीय रचना

  2. सर्वश्रेष्ठ कवि बनने पर बहुत बहुत बधाई👌👌👌👌👏👏👏👏👏👏👍👍

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