मेरें दामन मे दर्द का सिलसिला है

वज़्न – 122 122 122 122
अर्कान – फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन
बह्र – बह्रे मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम

काफ़िया – आ (स्वर)
रदीफ- है।

मेरें दामन मे दर्द का सिलसिला है।
रहा हर सफ़र जिन्दगी की सज़ा है।

वफा जिन्दगी भर किया धड़कनों का,
न जीना सका मैं, न आया मजा हैं।

कदम जब मेरा हौंसला कर उठा तो,
ड़गर साँस, काटें चुभाता सदा है।

जिधर देखता हूँ उधर नफरतें है,
मुहब्बत पे अब और पहरा लगा है।

फ़िकर जिस्म का जो किया हमने योगी,
जहाँ का सितम और बढ़ने लगा है।

स्वरचित,मौलिक
योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोड़ा (छ ग) 496111
7000571125
२४०३२०१८

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