मैं ख़्वाब में नहीं

तुम्हारे सुर्ख लबो में वो कशिश है,
जो किसी शराब में नहीं।
तुम्हारे तन कि वो मदहोश खुशबू है,
जो किसी गुलाब में नहीं।
तुम्हारे आगोश में वो जादू है,
जो किसी भी शबाब में नहीं।
तुम मेरी हो यही हकीकत है,
जमाने से कह दो मैं ख़्वाब में नहीं।
मेरी मोहब्बत में वो ज़लज़ला है।
जो दरिया के सैलाब में नहीं।
तुम्हारी ज़ुदाई में वो तकलीफ है।
जो किसी अज़ाब में नहीं।

देवेश साखरे ‘देव’

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10 Comments

  1. Antariksha Saha - October 10, 2019, 11:28 am

    खूब कहा

  2. Poonam singh - October 10, 2019, 7:27 pm

    Sundar

  3. NIMISHA SINGHAL - October 11, 2019, 7:57 am

    ,😀

  4. महेश गुप्ता जौनपुरी - October 11, 2019, 8:18 pm

    वाह बहुत सुंदर रचना ढेरों बधाइयां

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