मैं पुहुप हूँ गांव का

मस्तमौला चाल मेरी
मैं पुहुप हूँ गांव का
आ गया तेरे शहर
कंटक समझ मत पांव का।
घूमता बेघर फिरा हूँ
है मनोरथ छांव का
जिंदगी वारिधि सरीखी
क्या भरोसा नाव का।


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12 Comments

  1. Chandra Pandey - December 9, 2020, 11:06 pm

    Very nice lines

  2. Piyush Joshi - December 10, 2020, 8:06 am

    बहुत खूब

  3. harish pandey - December 10, 2020, 9:46 am

    Wah bhut khub

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 10, 2020, 9:51 am

    अतिसुंदर भाव

  5. Geeta kumari - December 10, 2020, 7:01 pm

    बहुत खूब

  6. Pragya Shukla - December 11, 2020, 10:55 pm

    बहुत उम्दा व रोचक

  7. Satish Pandey - December 26, 2020, 10:13 am

    Dhanyawad

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