मैं, मैं न रहूँ !

खुशहाल रहे हर कोई कर सकें तुम्हारा बन्दन।
महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।।
दमक उठे जीवन जिससे
वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ !
उपवास करे जो रब का
उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ !
सिंचित हो जिससे मरूभूमि
उस सारंग की धार बनूँ !
दिव्यांगता से त्रस्ति नर के
कम्पित जिस्म की ढाल बनूँ !
मैं, मैं ना रहूँ,
हारे- निराश हुए मन की,
आश बनूँ !
बिगत वर्ष में में
जिनका अबादान मिला
कृतज्ञता ज्ञापित,
उनकी मैं शुक्रगुजार बनूँ!
मुकाम कैसा भी आये
पर मन में थकान न आये
हे ईश! हर मुश्किल में
संभलने का समाधान बनूँ!


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10 Comments

  1. Suman Kumari - January 1, 2021, 9:58 pm

    “रफ़्तार”
    भूलवश
    “अफ्ताऱ”
    पढ़ा जाये ।

  2. Satish Pandey - January 1, 2021, 10:43 pm

    बहुत सुन्दर रचना, उत्तम अभिव्यक्ति

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 2, 2021, 7:53 am

    सुंदर भाव

  4. Anu Singla - January 2, 2021, 9:01 am

    Very nice

  5. Geeta kumari - January 2, 2021, 9:10 am

    “महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।।
    दमक उठे जीवन जिससे”
    बहुत सुंदर पंक्तियां , बहुत सुंदर कविता

  6. Rajeev Ranjan - April 19, 2021, 5:01 pm

    bahut suder kavita
    suman jee
    दमक उठे जीवन जिससे
    वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ !
    उपवास करे जो रब का
    उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ !
    सिंचित हो जिससे मरूभूमि
    उस सारंग की धार बनूँ !

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