मैं हिन्दी हूं

मैं हिन्दी हूं
भारत की भक्त हिन्दी,
संस्कृत मेरी जननी
जिसमें अंकित है संस्कृति,
उस संस्कृति की अब मैं उत्तराधिकारणी,
उद्धरित हुई मेरे संग कई और बहने भी,
उर्दू, पंजाबी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी,
हरियाणवी, गढ़वाली व दक्खिनी,
पर बस गई सब अपनी नगर में ही,
मैं ही कहीं एक जगह न बैठी रही,
भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक चलती रही,
देश को एक कोने से दूसरे तक जोड़ती रही,
प्रेम के पैगाम अपने संग लेकर चलती रही,
सब अपनाते गए मुझे, अपने हिसाब से बदलते रहे,
मैं हर भाषा को खुद में ढालकर खुद को निखारती रही,
हर प्रान्त से कुछ लेकर उसे देश को समर्पित करती रही,
खड़ी बोली से शुरू होकर अब तक उसी प्रयत्न में रही,
कि भारतवर्ष को एक लड़ी में पिड़ो कर बढ़ती रहूं,
हजारों वर्ष का सफ़र मैं यहां तय कर चुकी
पर अफसोस की मेरी इज्जत मेरे अपनों ने ही नीलाम की,
न जाने क्यूं मेरे साथ से उनका ओहदा कम होने लगा,
मुझे एक एक कर कितनों ने ही त्याग दिया,
मेरी जगह अपने शोषकों की भाषा तक को अपना लिया,
मुझे अपनाने में उन्हें शायद गुलामी का बोझ याद आ गया
तभी तो दो सौ वर्ष के उन अत्याचारी साहबों को अपना बना लिया,
और मुझे अपनी जिंदगी से दरकिनार कर दिया,
अपने ही देश में आज मेरी दशा गुलाम भारत सा कर दिया,
देशी को फ्लॉप और विदेशी को हीरो बना दिया,
अब भी एक आस है, कोई तो मेरा सही परिचय दे दे,
नई पीढ़ी को कोई तो मेरा इतिहास भी बता दे,
मुझे कफ़न ओढ़ाने से पहले कोई
नई पीढ़ी को मेरा असली चेहरा तो दिखा दे,
जो आज मुझे बकवास समझ कर मुझे देखता भी नहीं,
मेरी रचनायें तो दूर, मेरी लिपि तक को समझता भी नहीं!
©अनुपम मिश्र

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