मैत्री

वृत्ति मान्गकर जीवन यापन करने वाले
के अंतरंग द्वारिकाधीश थे
निज हाथों से सुदामा के चरण पखारते
सच्चे मित्र श्रीकृष्ण थे ।।
मित्रता हो ऐसी जहाँ भेद न कोई रह जावै
मित्र का दुख स्वदुख से भी ज्यादा कष्टप्रद लागै
सुग्रीव के दुख से जैसे दुखी जगदीश थे ।
बिन मांगे, कष्टोंसे बचाने,हाथ जो खुद आगे आवे
सही मारने में साखी कहलाने का पद वो पावे
ऐसो संगी रब से मिला बख्शीश है ।।
गुरूकुल में शुरू,छोटी सी थी जिनकी कहानी
मित्रता निभाई ऐसे,जैसे कर्ज हो सदियों पुरानी
यूँ ही साथ निभाना जैसे निभाये श्रीकृष्ण थे
Happy friendshipday

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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