मौत एक सत्य

मेरे आशिक ,तूने मुझे पुकारा!
तो मैं जरूर आजाऊंगी,
किसी के पास देर से आती हूं ,
किसी के पास जल्दी से आती हूं,
तुमने ललकारा है तो क्षण में आ जाऊंगी ।
तू कर जिंदगी खराब अपनी,
कर नशा ,पी शराब ,कर अय्याशी!
तू खेल मेरे साथ, तुझे खूब खिलाऊंगी,
मैं मौत हूं !  तुझे सच में खा जाऊंगी।

हां वही हूं मैं जिससे सब,
थरथर कापते,
पास तो दूर की बात,
सब दूर से ही नाचते ।
प्यार जो किया है तूने मुझसे
अब कैसे ना तुझे अपनाऊंगी
मैं मौत हूं ! तुझे सच में खा जाऊंगी।

आ निचोड़ दू तेरे अहम् को,
मरोड़ दूं, तेरे वहम को,
क्यों तड़पता है मेरे लिए
आ तुझे हमेशा के लिए सुलाऊंगी
मैं मौत हूं, तुझे सच में खा जाऊंगी।

                            ———  मोहन सिंह मानुष

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  1. अत्यंत सरल शब्दों में सच्चाई को प्रकट किया गया है, शिल्पगत विशेषता में काव्यानुरूप लय स्थापित हुई है, बहुत खूब

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