यादों की परछाईं

आँखों में जब उमड़ है उठता
बीता हुआ अतीत
फिजाओं में तब गूंज हैं
उठते भूले-बिसरे गीत
एक-एक कर स्मृति में
वो पल घुमड़-घुमड़
आ आते हैं
ना जाने अब कहाँ खो गये
वो पल वो मनमीत
यादों की परछाईं जब
धुंधली पड़ जाती हैं
महक उठते हैं सपने प्यारे
तरुणाई मुसकाती है
चल देती हूँ जब मैं
मीठे लम्हों की बारातों में
विरहिणी आँखों से
पावस मचल-मचल
बह जाती है…


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9 Comments

  1. Anu Singla - October 14, 2020, 4:18 pm

    सुंदर

  2. Geeta kumari - October 14, 2020, 7:05 pm

    बहुत ही भाव पूर्ण रचना है प्रज्ञा जी । बहुत सुंदर प्रस्तुति

  3. Satish Pandey - October 14, 2020, 8:13 pm

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  4. Shyam Kunvar Bharti - October 14, 2020, 10:29 pm

    bahut hii bhawapurn rachana yado ki parchhai

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 15, 2020, 12:16 pm

    बहुत ही सुंदर रचना

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