यादों की परछाईं

आँखों में जब उमड़ है उठता
बीता हुआ अतीत
फिजाओं में तब गूंज हैं
उठते भूले-बिसरे गीत
एक-एक कर स्मृति में
वो पल घुमड़-घुमड़
आ आते हैं
ना जाने अब कहाँ खो गये
वो पल वो मनमीत
यादों की परछाईं जब
धुंधली पड़ जाती हैं
महक उठते हैं सपने प्यारे
तरुणाई मुसकाती है
चल देती हूँ जब मैं
मीठे लम्हों की बारातों में
विरहिणी आँखों से
पावस मचल-मचल
बह जाती है…

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