रक्षा बंधन

रक्षा का त्योहार है, ये बंधन नहीं है, प्यार है।

मूल्य ना आंको भेंट का, यह प्रेम का उपहार है।

दुरियां- नजदिकीयां, ये भृम का जंजाल है।

भाव बिना हैं तीर्थ क्या, प्रेम हो तो मूरत में भी भगवान हैं।


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6 Comments

  1. Suman Kumari - August 4, 2020, 3:58 pm

    good

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - August 5, 2020, 6:59 pm

    ,सुन्दर रचना

  3. Satish Pandey - August 5, 2020, 10:23 pm

    बहुत खूब

  4. Tarun Bhatnagar - August 5, 2020, 10:40 pm

    हार्दिक धन्यवाद।

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