रावण दहन

रावण का पुतला जला जला
अम्बर को काला कर डला।
अहंकार का पुतला जला न पाया
खुद को रावण कर डाला।।

सत्य धर्म के ख़ातिर
वन-वन भटके नारायण।
जिनकी दिनचर्या कथा रुप में
लिखा गया रामायण।।

सेवा और त्याग की मूरत
लक्ष्मण और भरत थे सुखरासी।
स्वार्थ की बेदी पर बाली
हो गए कैसे स्वर्गवासी।।

विनयचंद रे देख तू दुनिया
बन जा मानव सुखकारी।
सेवा त्याग तपस्या से
पाओगे प्रभु दुखहारी।।
पं विनय शास्त्री

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4 Comments

  1. NIMISHA SINGHAL - October 7, 2019, 8:28 pm

    Nice

  2. Poonam singh - October 7, 2019, 9:05 pm

    Nice

  3. देवेश साखरे 'देव' - October 8, 2019, 3:10 pm

    सुन्दर रचना

  4. महेश गुप्ता जौनपुरी - October 8, 2019, 7:44 pm

    वाह बहुत सुंदर

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