रिक्शा

एक निर्जीव -सी मोटर गाड़ी ।
शानो शौकत की बनी सवारी।।
ये भी मांगे तेल और पानी।
घिस गए पुर्जे हुई पुरानी।।
अपने जैसा वंदा अखीर।
खीचे रिक्शा लगा शरीर ।।
एक अकेला खींच रहा हो।
हम बैठे हो आखिर दो दो।।
खून पसीना बहा रहा है।
रामू से रिक्शा कहा रहा है।।
शर्म नहीं आती क्यों हमको।
न उचित मजूरी देते उसको।।
‘विनयचंद ‘ वो भी मानव है
उसका नित सत्कार करो।
उसका भी एक परिवार है
,सेवक बन आधार बनो।।


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3 Comments

  1. Geeta kumari - January 11, 2021, 12:43 pm

    बहुत ही सुन्दर रचना है कवि विनय चंद शास्त्री जी ने अपनी कविता के माध्यम से समाज को संबोधित करते हुए कहा है कि निर्धन व्यक्ति पर दया भाव दिखाना चाहिए और उसकी उचित मजदूरी उसको दे देनी चाहिए ।….”अपने जैसा वंदा अखीर। खीचे रिक्शा लगा शरीर ।।
    वो भी तो एक इन्सान है .. इंसानियत का पाठ पढ़ाती हुई बहुत उम्दा रचना

  2. Satish Pandey - January 11, 2021, 10:47 pm

    उसका नित सत्कार करो।
    उसका भी एक परिवार है
    ,सेवक बन आधार बनो।।

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ। यथार्थ से आदर्श की ओर जाती बेहतरीन रचना।

  3. Anu Singla - January 12, 2021, 7:47 am

    बहुत सुन्दर विचार हैं आपके, सुन्दर भाव

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