लम्हे..

ज़िन्दगी से कुछ लम्हे,
बचाती रही
एक बटुवे में उन्हें,
सजाती रही
सोचा था कि फुरसत से
करूंगी खर्च,
ज़िन्दगी में
इसीलिए बचाती रही,
कुछ लम्हे
कुछ अपने लिए,
कुछ अपने अपनों के लिए
फ़िर ज़िन्दगी बीतनी थी,
बीत गई…
एक दिन सोचा,बटुआ खोलूं
बटुआ खोला….
एक भी लम्हा ना मिला,
कहां गए, मेरे सब लम्हे
कोई जवाब भी नहीं मिला
फ़िर सोचा, चलो आज थोड़ी
सी फुरसत है,
मिलती हूं खुद से ही..
जा के आइने के सामने खड़ी हो गई
बालों में कुछ चांदी सी पड़ी थी,
वो कुछ-कुछ मेरे जैसी ही लगी
वो आइने में,पता नहीं कौन खड़ी थी..

*****✍️गीता


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10 Comments

  1. Pragya Shukla - October 21, 2020, 3:18 pm

    बहुत धांसू कविता बोले तो दमदार…

    • Geeta kumari - October 21, 2020, 3:23 pm

      इस धांसू समीक्षा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा।
      बोले तो Thank you hai ji.

      • Pragya Shukla - October 21, 2020, 3:35 pm

        Hahaha..
        आता है नहीं हमे तारीफ करना तो क्या करें देशी भाषा में कर लेते हैं

    • Geeta kumari - October 21, 2020, 4:31 pm

      बहुत बढ़िया है प्रज्ञा दिल खुश कर दिया,कुछ दुखी सा था आज

      • Pragya Shukla - October 21, 2020, 10:40 pm

        बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं सैनोरीटा..

    • Geeta kumari - October 21, 2020, 10:58 pm

      😊

  2. Satish Pandey - October 21, 2020, 3:49 pm

    कवि गीता जी की एक लाजवाब अभिव्यक्ति है यह।

    • Geeta kumari - October 21, 2020, 4:38 pm

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका सतीश जी, सादर आभार 🙏

  3. MS Lohaghat - October 21, 2020, 4:42 pm

    बहुत खूब

    • Geeta kumari - October 21, 2020, 8:07 pm

      बहुत बहुत धन्यवाद सर सादर आभार 🙏

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