लालच वृद्धि करता प्रति पल

जंगल का दोहन कर डाला,
इन्सान तेरे लालच ने।
कुदरत के बनाए पशु-पक्षी भी ना छोड़े,
इन्सान तेरे लालच ने।
हाथी के दांत तोड़े,
मयूर के पंख न छोड़े
मासूम से खरगोश की
नर्म खाल भी नोच डाली,
इन्सान तेरे लालच ने।
चंद खनकते सिक्कों की खातिर,
यह क्या जुल्म कर डाला।
सृष्टि की सुंदरता का अंत ही कर डाला
इन्सान तेरे लालच ने।
कितना भी मिल जाए फिर भी,
लालच वृद्धि करता प्रति पल।
सुंदर पक्षी ना शुद्ध पवन
कैसा होगा अपना कल।
लगा लगाम लालच पर अपने
सोच यही होगा इसका फ़ल।।
____✍️गीता

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Responses

  1. सुंदर पक्षी ना शुद्ध पवन
    कैसा होगा अपना कल।
    लगा लगाम लालच पर अपने
    सोच यही होगा इसका फ़ल।।
    अद्भुत लेखन, लाजवाब कविता। वास्तविकता को पूरी तन्मयता के साथ प्रस्तुत किया गया है। भाषा सरल व सहज है। वाह

    1. इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी।
      आपकी दी हुई समीक्षाएं सदैव ही उत्साहवर्धन करती हैं।

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