लेखक की गरीबी (३)

(भाग दो में आपने पढ़ा – रुपा अपने पति के पेट की आग बुझाने के लिए खुद को दिलचंद के हाथों बिकने के लिए तैयार हो जाती है। वह अपने पति के ख़ातिर इज्ज़त क्या अपनी जान तक न्यौछावर कर सकती है। दिलचंद उसकी इज्ज़त दूकान के चंद पैसों के उधार से वह खरीदना चाहता है। क्या , दिलचंद रुपा के इज्ज़त को खरीद पाता है? क्या जीवनबाबु अपनी पत्नी को दिलचंद के हाथों बेच देता है?) यह जानने के लिए अब आगे —
रुपा रोती हुई जी़वनबाबु से लिपट कर – “स्वामी । मैं टूट चुकी हूँ। मै आपको भूखे पेट कैसे सोने देती। दिलचंद से अपनी इज्जत की सौदा मैं शौक से नहीं किया। स्वामी यहाँ तक कि मैं उसके संग शर्त भी कर चुकी हूँ। जीवनबाबु – “रुपा। क्या तुम्हारा मन यह काम करने को कहता है”।रुपा जीवनबाबु को गले लगा कर — “नहीं स्वामी। मैं मर जाउंगी । मगर यह काम कभी नहीं करुंगी। शर्तें मान लेना यह तो मेरी मजबूरी थी। अपने पति के ख़ातिर ” ।जीवनबाबु — “अब कुछ नहीं हो सकता है। मेरे हिसाब से दिलचंद की शर्तें हम दोनों को मिलकर कर पुरा करना चाहिए। जरा बाहर देखो तो मुर्दे समाज गहरी नींद में सो गये है क्या”? रुपा जीवनबाबु को ऐसे देख रही थी जैसे वह आठवां अजूबा हो। रुपा बाहर झाँक कर देखी। उस समय सारे लोग नींद की आगोश में समा चुके थे। जीवनबाबु अपनी रुपा को ले कर घर से निकल पड़े। रुपा हर बार अपने पति के तरफ देख कर रो पड़ती थी। जीवनबाबु बिंदास दिलचंद बनिया के दूकान के तरफ बढ़ते जा रहे थे। कुछ क्षण पश्चात दोनो दिलचंद बनिया के दूकान पर पहुंच गए। जीवनबाबु रुपा को इशारा किया। दरवाजे पर दस्तक दो। दस्तक सुनते ही जैसे दिलचंद दरवाजा खोला वैसे ही उसकी नज़र जीवनबाबु पर पड़ी। वह डर गया। वह अपनी नज़र जमीन पर गड़ाते हुए कहा – “मुझे माफ कर दीजिए जीवनबाबु। मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई है ” ।जीवनबाबु -“माफी तो मुझे मांगना चाहिए। रुपा को लाने में जरा देर हो गई है “।
दिलचंद जीवनबाबु को समझ नहीं पाया। वह हाथ जोड़ कर जीवनबाबु के पांव पे गिर कर अपनी गलती की क्षमा माँगने लगा। जीवनबाबु – “मेरी पत्नी पर बुरी नजर तूने इसलिए डाली कि मैं गरीब हूँ। तुम्हें भला मैं क्या कर सकता हूँ “।दिलचंद – “बस! बस! मुझे और शर्मिंदा नहीं करे जीवनबाबु। मैं अपनी दौलत के दम पर आपकी इज्ज़त व भाभी जैसी माँ को अपमान करने का दुःसाहस किया। मै भूल गया था कि मेरी भी दो जवान बेटियाँ है। जीवनबाबु आप मुझे इस गलती की कठोर सजा दे कर मुझे लज्जित करे। मैं इसी क़ाबिल हूँ। इतना कह कर दिलचंद दोनों के पांव पकड़ कर रोने लगा। जीवनबाबु – “आज मेरी कदमों में तेरी शान शौकत सब झुक गया।आज के बाद तुम किसी गरीब पर अपनी बुरी निगाहे डालने से पहले यह सोच लेना कि तेरी घर में भी बेटी या बहने होगी।
इतना कह कर जीवनबाबु अपनी पत्नी रुपा को ले कर वहाँ से चल पड़े। दिलचंद बनिया उन दोनों को देखता ही रह गया।


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7 Comments

  1. Suman Kumari - September 27, 2020, 5:41 pm

    बहुत सुन्दर

  2. Geeta kumari - September 27, 2020, 5:55 pm

    Happy Ending.All is well that ends well…

  3. Satish Pandey - September 27, 2020, 6:37 pm

    बहुत खूब बहुत सुंदर

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 27, 2020, 8:49 pm

    बहुत ही सुंदर रचना
    ठीक एक जासूसी उपन्यास की तरह दिमाग की बत्ती जलाने वाली प्रेरक एवं सुखान्त कहानी।
    अतिसुंदर। शब्दों का उचित एवं भावपरक प्रयोग। काबिल- ए-तारीफ़।।

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