लेखक की गरीबी

जीवनबाबु अपने मोहल्ले में प्रतिष्ठत व्यक्ति थे। वह एक साहित्यकार भी थे। हमेशा किसी न किसी पत्र व पत्रिकाओं के लिए रचनाएं तैयार करते थे। उनकी पत्नी रुपा इतनी सुंदर थी कि वह कभी कभार अपनी पत्नी को ही देख कर कविता, गीत व ग़ज़ल रच लिया करते थे। कमी थी तो केवल अर्थ व्यवस्था की। वह अपना घर परिवार चलाने के लिए प्राइवेट कोचिंग व स्कूल में पढ़ाया करते थे। तब कहीं जा कर दो वक्त की रोटी जुटा पाते थे। कभी कभार किसी न किसी पत्र व पत्रिकाओं के माध्यम से दो तीन सौ रुपये का मनीअर्डर भी आ जाया करता था। एक दिन शाम के समय रुपा घर के चौखट पर बैठ कर रो रही थी। समय यही कोई सात बज रहा था। जीवनबाबु कहीं से पढ़ा कर घर लौटे। रुपा को रोते देख कर पूछ बैठे — “क्या हुआ रुपा? रो क्यों रही हो? किसी ने कुछ कहा क्या? “रुपा उनके सूखे होंठ देख कर समझ गई ,शायद उन्हें दिन भर दाना नसीब नहीं हुआ है। वह एक भारतीय नारी है। भला अपने पति को भूखे पेट कैसे सोने देगी। घर में अन्न के एक दाना तक नहीं है। रुपा — “आज घर में अन्न के एक दाना तक नहीं है। मैं आपके लिए खाना क्या बनाउंगी। मैं आपको भूखे पेट कैसे सोने दूंगी। यही सोच मुझे रोने पर मजबूर कर दिया है “।जीवनबाबु — “इतनी मेहनत करने के उपरांत भी हम अन्न के लिए तरस रहे है।क्या हमने तक़दीर पाई है”।रुपा – “मोहल्ले में शायद ही कोई ऐसा घर बचा होगा जिस घर से मैं आटा या चावल न लायी हूँ “। दिलचंद बनिया के पिछला हिसाब भी चुकता नहीं हो पाया है “।जीवनबाबु — “हिम्मत न हारो रुपा। आज नहीं तो कल अवश्य ही हमारी तकदीर बदलेगी। दुःख सुख तो इन्सान के जीवन में आता जाता ही रहता है। नाजुक परिस्थिति में इंसान को घबड़ाना नहीं चाहिए। सुख को सभी गले लगाते हैं मगर दुःख को कोई बिरले ही गले लगाते है । रात के नौ बज रहे है। एक काम करो गी “?
रुपा — “क्या ।जीवनबाबु ” तुम दिलचंद बनिया के यहाँ जाओ। वह तुम्हें राशन उधार दे देगा ।मेरा नाम कह देना “।रुपा –“नहीं नहीं मै नहीं जाउंगी। आप ही चले जाइये न “।जीवनबाबु -“मैं आज तक दिलचंद बनिया के दूकान पर कभी नहीं गया।लेन देन के हिसाब भी हमेशा तुम ही करती आई हो। मुझे वहां जाना कुछ अच्छा नहीं लगेगा “।जीवनबाबु के लाख समझाने पर रुपा दिलचंद बनिया के दूकान पर जाने के लिए तैयार हुई। रात के यही कोई दस या सवा दस का वक्त था। मोहल्ले के सारे लोग खा पी कर बिस्तर पर लेट कर इधर उधर के बातों में मशगूल थे। माघ का महीना था। चारो तरफ कोहरा ही कोहरा था। रुपा अपनी पुरानी शाल से अपने को ढंकती हुई दिलचंद बनिया के दूकान के तरफ चली जा रही थी। (शेष अगले अंक में)


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3 Comments

  1. Geeta kumari - September 23, 2020, 3:52 pm

    Interesting story

  2. Satish Pandey - September 23, 2020, 4:33 pm

    अतिसुन्दर

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 23, 2020, 8:23 pm

    ,सुंदर

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