वह एक मज़दूर है

भवन बनाए आलीशान,
फ़िर भी उसके रहने को
नहीं है उसका एक मकान।
झोपड़पट्टी में रहने को मजबूर है
हाँ, वह एक मज़दूर है।
मेहनत करता है दिन रात,
फ़िर भी खाली उसके हाथ।
रूखी- सूखी खाकर वह तो,
रोज काम पर जाता है।
किसी और का सदन बनाता,
निज घर से वह दूर है,
हाँ, वह एक मज़दूर है।
सर्दी गर्मी या बरसात,
चलते रहते उसके हाथ।
जीवन उसका बहुत कठिन है,
कहता है किस्मत उसकी क्रूर है।
हाँ, वह एक मज़दूर है।।
_____✍️गीता


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10 Comments

  1. Rakesh Saxena - February 25, 2021, 8:45 pm

    हाँ, वह एक मज़दूर है।
    मेहनत करता है दिन रात,
    फ़िर भी खाली उसके हाथ।

    मजदूर की व्यथा की बहुत सुंदर प्रस्तुतीकरण

  2. Prabhat Pandey - February 25, 2021, 10:14 pm

    Bahut hi khubsurat Rachana, mujhe bahut acchi lagi

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - February 26, 2021, 4:14 pm

    बहुत खूब

  4. Satish Pandey - February 28, 2021, 4:54 pm

    भवन बनाए आलीशान,
    फ़िर भी उसके रहने को
    नहीं है उसका एक मकान।
    झोपड़पट्टी में रहने को मजबूर है
    ——- बहुत खूब, अति उत्तम रचना।

    • Geeta kumari - February 28, 2021, 7:02 pm

      समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी

  5. Pragya Shukla - March 8, 2021, 1:44 pm

    Nice

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