विरह वियोग

कविता- विरह वियोग
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अब हम किससे
अपना दर्द कहे,
कहां हम जाएं की-
अपने दर्द की दवा मिले|

जब भी चेहरा याद आता है,
शृंगार रस के सपनों में डूब जाता हूं,
जैसे ही चेहरा दुख देता है-
विरह वियोग में हो जाता हूं|

उसकी एक गलती-
आंखों में आंसू भर देती है,
मेरा सच्चा साथी, कलम कॉपी,
हस के हमसे कहता है,
उठा मुझे और भड़ास निकाल ले,
या मन में उठे विचारों की राह बदल दे|

तुझे क्या लगता है-
जीवन में सब कुछ तू ही खोया है?
हे पागल प्रेमी दीवाना,
शीश उठा देख जरा,
तेरे जैसी कईयों रोए हैं|

तू क्या खोया क्या पाया,
हम तुझको आज बताता हूं,
तू वह खोया जो तेरा था ही नहीं,
तू वह पाया जग में जो सब को मिला नहीं|

जिसको प्यास लगी पानी पीता,
जिसको भूख लगी भोजन करता,
जब जब किसी के दिल पर-
आवारा पागल प्रेमी का इल्जाम लगा,
तब ऐसे पागल प्रेमी आवारा ही-
जिद में आकर सुंदर सा इतिहास रचा|

अब मत रो हंसने की बारी है,
अब मत सो चलने की बारी है,
तु आज है रोया, कुछ ऐसा कर,
कल तेरी खुशियों में पूरी दुनिया रोए|
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****✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”——-

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Responses

  1. विरह की बहुत सूक्ष्मता के साथ अभिव्यक्ति जिससे मेरे मन में भी कविता लिखने के भाव आ गये हैं

  2. बिरहा वर्णन करना सबके बस की बात नहीं होती महादेवी वर्मा जैसे प्रखर महिला कवित्री यों ने इसका वर्णन किया है आप उम्र में छोटे हैं परंतु आप का जज्बा सराहनीय है आपकी हर एक रचना काबिले तारीफ है

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