विरासत

विरासत
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दादा का बजता ग्रामोफोन ,कानों में गूंजा करता है ।
वह आज भी घूमा करता है आंखों के रोशन दानों में,
संगीत की धुन सुनते सुनते ,
कब समा गया. .. संगीत मधुर… इन कानों में ,
ना पता चला।

गीतों का मधुर कैसेट प्लेयर ,
जो रोज बजाया करते थे ,
पापा गुनगुनाया करते थे,

परेशानियों में कैसे हंसना है ,कब सीख गए?
ना पता चला।
कविता लेखन था मां का शौक,
उनकी कविताएं पड पड कर ,
लेखनी कब हाथों में चली ,
ना पता चला।

कलात्मकता व्यवहार में थी,
रोजाना के रोजगार में थी,
कब उतर गई व्यक्तित्व में ,
ना पता चला।
दादा दादी का मधुर लाड,
थोड़ा सा गुस्सा अधिक प्यार,
कब आत्मसात किया ,
ना पता चला ।
खूबसूरत सी विरासत ,
कब बन गई थी पहचान मेरी, ना पता चला।

निमिषा सिंघल

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6 Comments

  1. राम नरेशपुरवाला - September 16, 2019, 9:34 am

    Refressing

  2. देवेश साखरे 'देव' - September 16, 2019, 12:53 pm

    Behatarin

  3. Poonam singh - September 16, 2019, 3:17 pm

    Wahh

  4. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 16, 2019, 3:51 pm

    वाह जी वाह

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