वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो

देवी माँ का पूजन कर लो
लेकिन अपनी मां मत भूलो,
जिसने जनम दिया तुमको
वृद्धाश्रमों में ठूँसो।
थोड़ा सा सोचो-समझो,
बुजुर्गों की इज्जत कर लो,
अपने संतोष की खातिर उनको
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो।
जींर्ण शरीर क्षीण ताकत को
एक सहारा वांछित है,
बनो ठोस सहारा तुम
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो।
पूजन कर लो खुश रहो मगर
मां-बाप त्याग कर क्या पूजन
मां-बाप हैं ईश्वर यह समझो
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो।

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

  1. बिलकुल सही कहा आपने ।
    पहले जो घर की देवी है उसका सम्मान करें । चाहे वो माँ , पत्नी, बहन बेटी या सहकर्मी हो।

  2. कवि सतीश जी ने अपनी इस रचना के माध्यम से यह समझाने की सफल कोशिश की है कि हमें अपने बड़ों, बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए , ना कि उनकी सेवा करने की उम्र में उन्हें वृद्धाश्रम जैसी जगह पर छोड़कर अपने फ़र्ज़ से मुंह मोड़ लिया जाए । बहुत सुंदर संदेश और बहुत ही सुन्दर कविता..

New Report

Close