वो मेरा जीवनसाथी था….

मेरे सुंदर चेहरे और मीठी आवाज
पर टिका थे वो रिश्ते
जब आवाज घरघराने लगी
चेहरे पर झुर्रियां पड़ गईं
ढल गई जवानी
शाम-सी जब
दर्पण भी नजर चुराने लगा
तब टूट गये सारे रिश्ते
सब छोंड़ गये
मुझको मरते
तब दिया सहारा
जिन बाँहों ने
सहलाया जिसने हाँथों से
वह मेरा जीवनसाथी था
जो मेरे सुंदर चेहरे पर नहीं
सुंदर हृदय पर मरता था
उस समय समझ आया मुझको
ये जो सम्बंध होते हैं
वो सुंदर
हृदय और अटूट विश्वास पर
चलते हैं…..

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Responses

  1. वाह जी वाह
    प्रज्ञा जी आपकी कविता हमें बहुत आनंदित करती है हर एक आप लिखती रहे हम सब पढ़ते रहे

    1. आपके इस कमेंट से पता चला मुझे कि आपको मेरी कविताए पसंद आती हैं
      बहुत शुक्रिया

  2. वाह प्रज्ञा जी बहुत ही सुंदर कविता है। ये पंक्तियाँ और भी बेहतरीन हैं-
    जो सम्बंध होते हैं
    वो सुंदर
    हृदय और अटूट विश्वास पर
    चलते हैं…..

    1. जी, जीवन की सत्यता यही है अक्सर हम शारीरिक सुंदरता के प्रति आकर्षित होते हैं जबकि वह नश्वर होती है

  3. जीवनसाथी की महत्ता को बताते हुए तथा शारीरिक सौंदर्य वासना को नकारते हुए जिस प्रकार आत्मीयता को तथा आंतरिक सुंदरता के बारे में वर्णन किया गया है प्रज्ञा जी आपके द्वारा वह आपकी प्रखरता को काव्य प्रतिभा को प्रदर्शित करता है यह काम बहुत ही दूभर था परंतु आपने जिस प्रकार कर दिखाया वहां अचंभित करता है

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