शिखर

शिखर की ऊंचाईयों को टकते सभी,
पांव के छाले खून का रिसाव दिखता नहीं।
मेहनत हौसले को दुनिया समझती नहीं,
यहा के लोग बड़े जालिम है तरक्की देखते नहीं।।

✍महेश गुप्ता जौनपुरी


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6 Comments

  1. Master sahab - June 27, 2020, 9:31 am

    सर आपको इतनी जल्दी क्यों रहती है?कविता पोस्ट करने से पहले पढ़ लिया कीजिए, प्वांइट बढ़ाने के चक्कर में सब ंमजा किरकिरा हो जाता है। बाकी कवि बिना पढे ही कमेंट कर देते हैं। टोंकते नहीं, इसी।कारण मुझे आपसे अनुरोध करना पड़ता है। इस पर ध्यान दीजिए। आप एक अच्छे कवि हैं बस वर्तनी का ध्यान रखकर काव्य रचना करें

  2. Master sahab - June 27, 2020, 9:41 am

    यहाँ, ताकते या निहारते तकते

  3. Abhishek kumar - July 10, 2020, 11:09 pm

    त्रुटियाँ हैं

  4. Abhishek kumar - July 31, 2020, 2:25 am

    उम्दा कल्पना

  5. प्रतिमा चौधरी - September 26, 2020, 4:11 pm

    भाव बहुत सुंदर

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