सतत संग्राम

सतत संग्राम ज़िन्दगी का अंग बन गए है
मज़दूर हू मजबूर नहीं
लॉकडाउन का बहाना दे के तुमने मेरी नौकरी छीनी
भूखे हम है तोह भोजन छिना भी जा सकता है

किसान हू मेरे उत्पाद का दाम कॉर्पोरेट ठीक करेंगी
10 रुपए की मकई 200रुपए मे तुम बेचोगे
हमारे हक़ को मारोगे और हमे अदृश्य विकास की कहानी सुनाओगे और हम मान जाएंगे

पहले जमींदार थे जो हम पर शोषण करते थे
अब कोरोर्पोरेट के हाथों तुम हमे बेचोगे
भूल ना जाना हम किसान है
भूख जो तुम्हे लगती है तोह हम अन्न संस्तान है

हम बंजर ज़मीन पर अपने खून से फसल ऊगा सकते है
तोह हम इस बहरी सरकार के लिए धमाका भी कर सकते है
जितने भी जल कमान तुम चलाओ पेलेत गन की बौचार तुम करोगे
उतने हमारे हौसले बुलंद होंगे
जय मज़दूर जय किसान


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8 Comments

  1. Geeta kumari - December 21, 2020, 4:07 pm

    किसानों के हक में बोलती हुईं और हकीकत बयान करती हुई बहुत सुंदर रचना

  2. Sandeep Kala - December 21, 2020, 6:23 pm

    बहुत ही अच्छा

  3. Pragya Shukla - December 21, 2020, 7:16 pm

    True line nice poem

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 21, 2020, 8:50 pm

    बेहतरीन

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