सबका समय

कविता- सबका समय
—————————–
सब का समय आता ,
सबको समझ न आता है,
आया जिसको समझ अगर,
खुद को समझा पाया है,

छोड़ दिया वह,
सब से लड़ना,
खुद के लिए या-
भारत मां के लिए लड़ता है|

मान सम्मान,
कुल का गौरव,
पद प्रतिष्ठा,
खुद का एक रिकॉर्ड बने,
उन से लड़ना बंद किया,
खुद कि नजरों में,
खुद जिनकी न पहचान बने|

दश बाई दश के, बन्द कमरे में,
ले किताब वह हाथों में,
कभी लेटे, कभी बैठे,
कभी चल चल के पढ़ता है,

कभी दाल जली तो ,
कभी रोटी जली,
कभी भुखे भी, वह सोता है|

रहता है वह प्रेमी बनकर,
सोता है नाम मात्र ही,
सच वह बड़ भोला है,
भारत माँ का बेटा है|
—————————–
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”———


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

8 Comments

  1. Pragya Shukla - October 11, 2020, 3:56 pm

    खूबसूरत रचना और गम्भीर विचार

  2. Satish Pandey - October 11, 2020, 5:13 pm

    निरंतर आपकी लेखनी में निखार आता जा रहा है ऋषि, बहुत खूब, सुन्दर रचना

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 11, 2020, 7:29 pm

    बहुत खूब

  4. Geeta kumari - October 11, 2020, 8:59 pm

    उत्तम भाव

Leave a Reply