समझ न पाए

बहुत ही कोशिश की,जरा हम भी बदले से जाएँ
पर कैसे अब तक यह मन, बात समझ न पाए ।
अपनों से दर्द मिले थे अकसर
शिकवा-शिकायत चलता ज्यादा- कमतर
अनजान भी कैसे चोट पहुँचाए, मन समझ न पाए ।
ना कोई रिश्ता, शत्रुता की ठौर कहाँ
बिन समझे ही, कैसा शोर यहाँ
सब एक हैं, काहे को पछताए, मन समझ न पाए ।
चन्द दिवस का साथ है अपना
यहाँ कहाँ हमको, इतिहास है रचना
बिन समझे ही क्यू बैर बढाय, मन समझ न पाए ।
दोष कयी मुझमें भी है, पर अनजाने में भूल गयी मैं
मिथ्या आरोप से आरोपित, गरिमा पद की विसर गयी मैं
खुद से खुद को कैसे वेधित कर, मन समझ न पाए ।

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

New Report

Close